किडनी की बीमारी देर से पकड़ में आती है, इसलिए RG हॉस्पिटल्स देहरादून ने समय पर जांच पर दिया जोर

RG हॉस्पिटल, देहरादून में एडवांस स्टेज में क्रोनिक किडनी डिजीज से पीड़ित मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

देहरादून। किडनी की बीमारी बिना किसी स्पष्ट लक्षण के बढ़ सकती है। कई लोगों में बहुत कम या कोई खास लक्षण नहीं दिखते, स्पष्ट लक्षण तब दिखते हैं जब किडनी का काम करना काफी कम कर देती है। देहरादून के RG हॉस्पिटल के डॉक्टरों का कहना है कि क्रोनिक किडनी डिजीज के मरीज बढ़ रहे हैं और किडनी के डॉक्टरों से सलाह लेने वालों की संख्या भी बढ़ी है। इससे पता चलता है कि किडनी की बीमारी को शुरुआती दौर में पहचानना अभी भी मुश्किल है, क्योंकि कई लोगों में इसके साफ लक्षण दिखाई नहीं देते।

क्रोनिक किडनी डिज़ीज़ अक्सर डायबिटीज़ और हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों से जुड़ी होती है। किडनी की बीमारी की फैमिली हिस्ट्री, पहले हुई एक्यूट किडनी इंजरी (AKI) और कुछ दवाओं का लंबे समय तक इस्तेमाल भी किडनी की बीमारी का खतरा बढ़ा सकता है। सरकारी गाइडलाइंस के अनुसार, डायबिटीज़, हाई ब्लड प्रेशर, CKD की फैमिली हिस्ट्री, ज्यादा उम्र या पहले AKI से पीड़ित लोगों को समय-समय पर किडनी की जांच करानी चाहिए।

RG हॉस्पिटल्स देहरादून के नेफ्रोलॉजी कंसल्टेंट डॉ भाविन ब्रह्मदत्त ने कहा, “किडनी की बीमारी हमेशा शुरुआती स्टेज में साफ़ लक्षणों से पता नहीं चलती। जब तक किसी व्यक्ति में सूजन, पेशाब कम आना, सांस फूलना, लगातार थकान, या दूसरे दिखने वाले लक्षण दिखते हैं, तब तक किडनी के काम करने के तरीके पर काफ़ी प्रभाव पड़ चुका होता है। इसीलिए जिन लोगों को डायबिटीज़, हाइपरटेंशन, किडनी की बीमारी की फ़ैमिली हिस्ट्री या पहले किडनी की समस्या रही है, उन्हें लक्षणों का इंतज़ार नहीं करना चाहिए। साधारण रक्त और मूत्र जांच के साथ किडनी का अल्ट्रासाउंड (USG) किडनी की संरचना और कार्यप्रणाली में होने वाले बदलावों की शुरुआती पहचान करने में मदद कर सकता है, जिससे समय पर चिकित्सकीय उपचार संभव हो पाता है।

डॉक्टर सलाह देते हैं कि ज़्यादा खतरे वाले लोग समय-समय पर किडनी की करवाते रहना चाहिए। जांच में व्यक्ति के रिस्क प्रोफ़ाइल के आधार पर सीरम क्रिएटिनिन के साथ अनुमानित ग्लोमेरुलर फ़िल्ट्रेशन रेट (eGFR) और एल्ब्यूमिन या प्रोटीन के लिए यूरिन टेस्टिंग शामिल हो सकती है। किडनी की बीमारी के लिए मौजूदा गाइडेंस में CKD के खतरे वाले लोगों में सिर्फ़ एक मार्कर पर निर्भर रहने के बजाय eGFR और यूरिन एल्ब्यूमिन की जांच करने की सलाह दी जाती है।

लोगों को लगातार थकान, पैरों या चेहरे में सूजन, पेशाब में बदलाव, पेशाब में खून, सांस फूलना या बिना वजह कमजोरी जैसे बदलावों पर भी ध्यान देना चाहिए। हालांकि, इन लक्षणों का न होना यह नहीं बताता कि किडनी ठीक से काम कर रही है। डायबिटीज़, हाई ब्लड प्रेशर या किडनी की बीमारी के दूसरे जोखिम वाले लोगों के लिए नियमित जांच खास तौर पर जरूरी है।

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