नवरात्र में मां दूनागिरि का आशीर्वाद लेने के लिए दूर-दराज से आते हैं भक्तजन

उत्तराखंड जिले में बहुत पौराणिक और सिद्ध शक्तिपीठ है, उन्ही शक्तिपीठ में से एक है द्रोणागिरी वैष्णवी शक्तिपीठ। वैष्णो देवी के बाद उत्तराखंड के कुमाऊं में “दूनागिरि” दूसरी वैष्णो शक्तिपीठ है। उत्तराखंड राज्य के अल्मोड़ा जिले के द्वाराहाट क्षेत्र से 15 किमी आगे माँ दूनागिरी माता का मंदिर अपार आस्था और श्रद्धा का केंद्र है।

द्वाराहाट में स्थापित इस मंदिर में वैसे तो पूरे वर्ष भक्तों की कतार लगी रहती है। मगर नवरात्र में यहां मां दुर्गा के भक्त दूर-दराज से बड़ी संख्या में आशीर्वाद लेने आते हैं। इस स्थान में “माँ दूनागिरी” वैष्णवी रूप में पूजी जाती है।

कुमाऊं के प्रसिद्ध इस मंदिर में नव दंपत्तियां मां का आशीर्वाद लेने के लिए आते हैं और पूजा अर्चना करते हैं। ताकि उनका आगे का जीवन सुखमय हो। दूनागिरी मंदिर के बारे में यह भी माना जाता है कि यहाँ जो भी महिला अखंड दीपक जलाकर संतान प्राप्ति के लिए पूजा करती है। देवी वैष्णवी उसे संतान का सुख प्रदान करती है।

दूनागिरी मंदिर की मान्यता यह भी है कि इस महाशक्ति के दरबार में जो शुद्ध बुद्धि से आता है और सच्चे मन से कामना करता है, वह अवश्य पूरी होती है। मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धालु मंदिर में सोने और चांदी के छत्र, घंटिया, शंख चढाते हैं।

मंदिर में लगी हुई हजारो घंटिया प्रेम, आस्था और विश्वास की प्रतीक है, जो भक्तों का माँ दूनागिरी के प्रति है। दूनागिरी मंदिर में कोई मूर्ति नहीं है, प्राकृतिक रूप से निर्मित सिद्ध पिण्डियां माता भगवती के रूप में पूजी जाती हैं। दूनागिरी मंदिर में अखंड ज्योति का जलना मंदिर की एक विशेषता है। दूनागिरी माता का वैष्णवी रूप में होने से इस स्थान में किसी भी प्रकार की बलि नहीं चढ़ाई जाती है। यहाँ तक की मंदिर में भेट स्वरुप अर्पित किया गया नारियल भी मंदिर परिसर में नहीं फोड़ा जाता है।

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